Saturday 22 March 2008

बागी था महावीर

तारीख स्याह रातों मे
मौत के सन्नाटों मे
तुन्दो तेज़ हवा चलती थी
खून के दरिया बहते थे
कहीं आहों की सदा आती थी
मजहब के आहनी हाथों मे
मौत के सन्नाटों मे
जिंदगी रो रही थी
सिसकियाँ भर रही थी
दूर मन्दिर से घंटों की सदा आती थी
लोग
हरे राम हरे क्रिशन भी कहते होंगे
मगर
कानो मे मेरे आवाज़ नही जा सकती
मेरे होंठ राम नही कह सकते
इस तरह पाबन्द थे जब लोग
मजहब की कैद मे बंद थे जब लोग
दूर चंदन की महक उड़ती थी
हवन यज्य हुआ करते थे
बीते हुए युग की बातें
याद करूं जी डरता है
तारीख स्याह रातों मे
मौत के सन्नाटों मे
हवन कुन्ड्डों मे लोग जला करते थे
नीच थे जो लोग जुदा रहते थे
जिन के पाऊँ मे जंजीरे थे
हाथ मे जंजीर
होठों पे लगे थे ताले
घुट घुट के मरे जाते थे
दादों फरियाद नही थी
नही अश्क रवां हो सकते
कोई ज़ज्बा परवान नही चढ़ सकता
प्यार ओ-मोहब्बत को नही कोई जगह
थी हालात पे वहशत तारी
हर शह से ज़माने की
मजहबी जोश-ओ-जूनून था भारी
हर दिल मे नफरत की आग लगी थी
जंगल भी जला बस्ती भी जली
गंगा का पवित्तर पानी भी जला
राम की पाकीजा धरती भी जली
बीते हुए युग की बातें
याद करूं जी डरता है
दिल किसी मुफलिस का शाद नही था
कुटिया किसी मजदूर की आबाद नहीं थी
दादों फरियाद नहीं थी
मगर,ऐसा भी नहीं था
कि
तेरी याद नही थी
घटा-टॉप अंधेरों का जिगर चाक हुआ
ज़ुल्मत का फुसुं टूट गया
आग जंगल की हो जैसे
यह ख़बर फएल गई
महलों से निकल कर जंगल की तरफ़ आया है कोई
अंधेरों से सहर छीन के लाया है कोई
रौशनी ता हद्ध-ऐ -नज़र फैल गई
इक हवा ऐसी चली
बगावत की हवा हो जैसे
मन्दिर के दरो दीवार हिले
सूरत भी हिली
भगवन की मूरत भी हिली
जद्द कोहना अकीदों की हिली
बीते हुए युग की बातें
याद करूं जी डरता है
रौशनी तहद्दै नज़र फैल गई
आग हवन कुंड्डों मे जलेगी
लेकिन
कोई जिस्म न जलने पाये
हर फूल को खिलने का हक है
हर एक की खातिर, दर मन्दिर का खुले
मन्दिर के दरो दीवार हिले
रौशनी ता हद्दे नज़र फैल गई
हर तरफ़ बगावत थी
मगर खून नही था
हर एक का हक है जीना
हर एक को हक दो
ये बात कही थी किसने
महलों से निकल कर जो जंगल की तरफ़ आया
जो अंधेरों से सहर छीन के लाया
भगवान जिसे कहते है ज़माने वाले
अछूतों का गरीबों का साथी था महावीर
निडर था दिलावर था बागी था महावीर







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