उजालों को
जन्म देने की जिद्द मे
मै
ख़ुद को बो रहा हूँ
अँधेरी ज़मीं के सीने मे
Thursday, 16 July, 2009
Thursday, 14 August, 2008
अंतराल
जब भी कोई शब्द मिला
साथ मिले उसके लाखों ही प्रश्न चिन्ह
युग युग की कविता और छंद अनेक
एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
संस्कृति के उच्च शिखरों पर
गौतम की सत्य अहिंसा
तप त्याग वर्धमान का
क्यों महलों से निकले ?
जंगल जंगल भटके क्यों ?
धर्मों के आदर्श कठोर
और उनके सुकुमार बदन
एटमकी गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
इन्द्र धनुषी पींगों के रंग
श्याम वर्ण से घुल जायेंगे
एक प्रश्न चिन्ह मे ढल जायेंगे
महा प्रलय का चित्रण
कैसे कोई चित्रकार करेगा ?
अंधियारे युग का वर्णनं इतिहासकार करेगा कैसे ?
ऐसे कोई परिकल्पना
हिमाच्छादित गिरिश्रिन्ख्ला
मनु कहीं पर बैठा होगा
और भटक रही होंगी कहीं श्रद्धा
आलिंगन - विकास विकास फ़िर
विकास की चरम सीमा
कोन किसीका चीर हरेगा
युद्ध शेत्र कहाँ बनेगा
किसके लिए लडेगा धर्मराज
वह शन् -कृष्ण जब
दिखलायेगा विराट रूप
ओर मोह भंग अर्जुन का होगा
इसबार मगर ऐसा कोई द्रश्यनही होगा
क्योंकि -युद्ध
मात्र एक शण का होगा
ओर यह सब एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
धर्मों के आदर्श कठोर
ओर उनके सुकुमार बदन
एटम की गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
साथ मिले उसके लाखों ही प्रश्न चिन्ह
युग युग की कविता और छंद अनेक
एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
संस्कृति के उच्च शिखरों पर
गौतम की सत्य अहिंसा
तप त्याग वर्धमान का
क्यों महलों से निकले ?
जंगल जंगल भटके क्यों ?
धर्मों के आदर्श कठोर
और उनके सुकुमार बदन
एटमकी गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
इन्द्र धनुषी पींगों के रंग
श्याम वर्ण से घुल जायेंगे
एक प्रश्न चिन्ह मे ढल जायेंगे
महा प्रलय का चित्रण
कैसे कोई चित्रकार करेगा ?
अंधियारे युग का वर्णनं इतिहासकार करेगा कैसे ?
ऐसे कोई परिकल्पना
हिमाच्छादित गिरिश्रिन्ख्ला
मनु कहीं पर बैठा होगा
और भटक रही होंगी कहीं श्रद्धा
आलिंगन - विकास विकास फ़िर
विकास की चरम सीमा
कोन किसीका चीर हरेगा
युद्ध शेत्र कहाँ बनेगा
किसके लिए लडेगा धर्मराज
वह शन् -कृष्ण जब
दिखलायेगा विराट रूप
ओर मोह भंग अर्जुन का होगा
इसबार मगर ऐसा कोई द्रश्यनही होगा
क्योंकि -युद्ध
मात्र एक शण का होगा
ओर यह सब एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
धर्मों के आदर्श कठोर
ओर उनके सुकुमार बदन
एटम की गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
Saturday, 19 July, 2008
अल्फ नंगी
न कोई नारा
न हाथ मे परचम
चेहरे पे मसर्रत के नकूश
न क़दमों मे बगावत
साथ उसके न कोई बशर था
न कोई ऐहसासऐ शामो सहर था
बरगद की घनी छाओं मे वह बैठा भी नही
कोई सदा
आहट भी नही कोई
जुल्फों की महक
आँचल की हवा
उसने तेरी आंखों मे देखा भी नही
घनी छाओं मे बैठा भी नही
सैंकड़ों सूरज
लाखों दरिया
समंदर और
कभी न पिघलने वाले बर्फ के घर
दुशवार जंगलों से
कैलाश की चोटियों तक
उसका साया , किसी ने देखा भी नही
वह गंगा के किनारे ठहरा भी नही
उसका साया ?
वह कोई बाद रूह तो नही
नही हरगिज भी नही
कृष्ण की राधा
यशोधरा और सीता
कृष्ण का सुदर्शन
अर्जुन के तीर और गांडीव
सुनसान रास्तों पर
एक कुटिया और
उसमे जलता हुआ दीया
दूर तक तपता हुआ सहरा
एक सरसब्ज दरख्त
और
उसका घना साया
भटके हुए रेवड़
टूटी हुई बंसी
एक बच्चा एक चरवाहा
आसमां पे दौड़ते हुए स्याह बादल
सितारे
ज़मीन और उसकी कशिश
शबनम और सफ़ेद मोती
कहकशां
नाजुक तितलियाँ
फूल और खुशबु
या
सरे मिज़गां ठहरा हुआ आंसू
वर्धमान का तप भी नही
मीरा की भक्ति
शिव की शक्ति भी नही
कुरान
बाइबल
गीता
चुप हैं अजंता की बोलती तस्वीर
शायद यहाँ जिंदगी लिबास बदलती है
मंजिल बहुत करीब है शायद
मय प्यालों मे डाल दो सारी
इधर उधर बिखेर दो शीशे
खुले रहे मयकदों के दरवाजे
मंजिलें बहुत करीब है शायद
हर तरफ धुआं -धुआं
शहर और बस्तियों पर
गिर रही है एटमी धुल
किसी का घर नही महफूज
लोग चाँद पर जा रहे हैं
पत्थर युग का आगाज़ है शायद
समझ नही आता किस तरह याद रखें
हजारों मील लम्बी तहजीब की नज्में
कोन याद रखेगा ?
खैर आओ चलो देखें
कहाँ है वह तहखाना
जहाँ महात्मा बुद्ध का एक अदद बुत
महफूज़ करना है
मंजिलें बहुत करीब हैं शायद
जिंदगी अल्फ नंगी खड़ी है
लगता है लिबास बदल रही है
न हाथ मे परचम
चेहरे पे मसर्रत के नकूश
न क़दमों मे बगावत
साथ उसके न कोई बशर था
न कोई ऐहसासऐ शामो सहर था
बरगद की घनी छाओं मे वह बैठा भी नही
कोई सदा
आहट भी नही कोई
जुल्फों की महक
आँचल की हवा
उसने तेरी आंखों मे देखा भी नही
घनी छाओं मे बैठा भी नही
सैंकड़ों सूरज
लाखों दरिया
समंदर और
कभी न पिघलने वाले बर्फ के घर
दुशवार जंगलों से
कैलाश की चोटियों तक
उसका साया , किसी ने देखा भी नही
वह गंगा के किनारे ठहरा भी नही
उसका साया ?
वह कोई बाद रूह तो नही
नही हरगिज भी नही
कृष्ण की राधा
यशोधरा और सीता
कृष्ण का सुदर्शन
अर्जुन के तीर और गांडीव
सुनसान रास्तों पर
एक कुटिया और
उसमे जलता हुआ दीया
दूर तक तपता हुआ सहरा
एक सरसब्ज दरख्त
और
उसका घना साया
भटके हुए रेवड़
टूटी हुई बंसी
एक बच्चा एक चरवाहा
आसमां पे दौड़ते हुए स्याह बादल
सितारे
ज़मीन और उसकी कशिश
शबनम और सफ़ेद मोती
कहकशां
नाजुक तितलियाँ
फूल और खुशबु
या
सरे मिज़गां ठहरा हुआ आंसू
वर्धमान का तप भी नही
मीरा की भक्ति
शिव की शक्ति भी नही
कुरान
बाइबल
गीता
चुप हैं अजंता की बोलती तस्वीर
शायद यहाँ जिंदगी लिबास बदलती है
मंजिल बहुत करीब है शायद
मय प्यालों मे डाल दो सारी
इधर उधर बिखेर दो शीशे
खुले रहे मयकदों के दरवाजे
मंजिलें बहुत करीब है शायद
हर तरफ धुआं -धुआं
शहर और बस्तियों पर
गिर रही है एटमी धुल
किसी का घर नही महफूज
लोग चाँद पर जा रहे हैं
पत्थर युग का आगाज़ है शायद
समझ नही आता किस तरह याद रखें
हजारों मील लम्बी तहजीब की नज्में
कोन याद रखेगा ?
खैर आओ चलो देखें
कहाँ है वह तहखाना
जहाँ महात्मा बुद्ध का एक अदद बुत
महफूज़ करना है
मंजिलें बहुत करीब हैं शायद
जिंदगी अल्फ नंगी खड़ी है
लगता है लिबास बदल रही है
Tuesday, 27 May, 2008
गमे दुनिया से कभी
दो चार घड़ी
गमे दुनिया से कभी
फुरसत जो मिले
दुनिया मे सुकूँ १ की बातें
दमकते हुए आरज २
होंठ
होंटों की फुंसुकार३ हँसी
निगाहों के फुंसूकी बातें
दुनिया मे सुकूँ की बातें
कैसी होती है खुशबु
कैसे खिलते हँ कमल
कैसे बहारों का समां आता है
और ज़ज्बा -ऐ -शौक जवाँ होता है
साकी -जाम -ओ - पैमाने४ के किस्से
सागर - ओ - मय - ओ - मयखाना
रक्स -ऑ -झंकार ५ ये नगमे
अफ्लास ६ की दुनिया से परे
नूर7 के सांचे मे ढले
कमखाब - ऑ८ अतलस का लिबास
रेशमी जुल्फें रेशमी आँचल
इसी धरती पर एक और भी धरती है
इन क़दमों का गुजर
नही जिसके सीने पर
उसके सुख कैसे हैं
लोग कैसे रहते हैं
प्यार के गीत क्या हैं
गीतों की लय क्या है
नयनों से मय का छलकना कैसा
गमे दौरां ९ से जरा
बस एक लमहा १०
फुरसत जो मिले ,राहत11 जो मिले
बिरहा की जलन है कैसी
साजन का मिलना है कैसा
इंतजार के पल क्या हैं
कैसे ढलते हैं सरेशाम
शाम के साये
मह्ब्ब्त की तपिश मे जलना
और जलते रहना
इश्क - ऑ जुनूं की बातें
ऐ काश कि हम भी सोचें
दो चार घडी
गमे दुनिया से कभी
राहत जो मिले
फुरसत जो मिले
______________________
1 शान्ति २ गाल ३ जादूभरी ४ मदिरा पिलाने का पात्र ५ नाच ६ निर्धनता ७ रौशनी ८ बहुमूल्य कपडों का नाम 9 दुःख भरा युग १० शंन ११ शान्ति
गमे दुनिया से कभी
फुरसत जो मिले
दुनिया मे सुकूँ १ की बातें
दमकते हुए आरज २
होंठ
होंटों की फुंसुकार३ हँसी
निगाहों के फुंसूकी बातें
दुनिया मे सुकूँ की बातें
कैसी होती है खुशबु
कैसे खिलते हँ कमल
कैसे बहारों का समां आता है
और ज़ज्बा -ऐ -शौक जवाँ होता है
साकी -जाम -ओ - पैमाने४ के किस्से
सागर - ओ - मय - ओ - मयखाना
रक्स -ऑ -झंकार ५ ये नगमे
अफ्लास ६ की दुनिया से परे
नूर7 के सांचे मे ढले
कमखाब - ऑ८ अतलस का लिबास
रेशमी जुल्फें रेशमी आँचल
इसी धरती पर एक और भी धरती है
इन क़दमों का गुजर
नही जिसके सीने पर
उसके सुख कैसे हैं
लोग कैसे रहते हैं
प्यार के गीत क्या हैं
गीतों की लय क्या है
नयनों से मय का छलकना कैसा
गमे दौरां ९ से जरा
बस एक लमहा १०
फुरसत जो मिले ,राहत11 जो मिले
बिरहा की जलन है कैसी
साजन का मिलना है कैसा
इंतजार के पल क्या हैं
कैसे ढलते हैं सरेशाम
शाम के साये
मह्ब्ब्त की तपिश मे जलना
और जलते रहना
इश्क - ऑ जुनूं की बातें
ऐ काश कि हम भी सोचें
दो चार घडी
गमे दुनिया से कभी
राहत जो मिले
फुरसत जो मिले
______________________
1 शान्ति २ गाल ३ जादूभरी ४ मदिरा पिलाने का पात्र ५ नाच ६ निर्धनता ७ रौशनी ८ बहुमूल्य कपडों का नाम 9 दुःख भरा युग १० शंन ११ शान्ति
Thursday, 8 May, 2008
एक लम्हा
सिर्फ़ एक लम्हा
वक्त की इकाई
इकाई का भी कोई हिस्सा
सिर्फ़ एक लम्हा
अजनबी निगाहें
निगाहों का हादसा
धड़कते जिस्म , जलते होंठ
नीम उरीयाँ १ जिस्म का उभरा हुआ हिस्सा
बेताब सदा २ ______ मैंने सोचा
बेताब सदा को
अल्फाज़ ३ का पैराहन ४ दूँ
वक्त की इकाई
इकाई का कोई भी हिस्सा____कैद कर लूँ
जंजीर पहना दूँ मगर
वक्त के तकाजों ने
ये हकीर ५ लम्हा भी छीन लिया हमसे
सिर्फ़ एक लम्हा
१ अर्धनग्न २ आवाज़ ३ शब्दों का ४ लिबास ५ तुछ
वक्त की इकाई
इकाई का भी कोई हिस्सा
सिर्फ़ एक लम्हा
अजनबी निगाहें
निगाहों का हादसा
धड़कते जिस्म , जलते होंठ
नीम उरीयाँ १ जिस्म का उभरा हुआ हिस्सा
बेताब सदा २ ______ मैंने सोचा
बेताब सदा को
अल्फाज़ ३ का पैराहन ४ दूँ
वक्त की इकाई
इकाई का कोई भी हिस्सा____कैद कर लूँ
जंजीर पहना दूँ मगर
वक्त के तकाजों ने
ये हकीर ५ लम्हा भी छीन लिया हमसे
सिर्फ़ एक लम्हा
१ अर्धनग्न २ आवाज़ ३ शब्दों का ४ लिबास ५ तुछ
Tuesday, 22 April, 2008
वह पगडण्डी
पूजा करूं मैं किसकी
कोन है मेरा इष्टदेव
किस मन्दिर मे फूल चडाऊँ
कहाँ जलाऊँ जा कर दीप
आँख खुली तो अँधियारा था
बड़े हुए तो आंधी तूफां
फिरे ढुढते जीवन भर
कहीं मिला न हम को भगवा
किस दर पर मै मिट जाऊं
किसे बनाऊ मीत
आँचल किसका थाम के बैठु
किसे करू मे प्रीत
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊं
बस्ती बस्ती डगर डगर
हम तो घूमे जीवन भर
मिली नही मस्तों की टोली
जिसमे मे मिल जाऊं
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊँ
कोई नही नदिया के तट पर
मुरझाये मुरझाये चेहरे
फीके फीके आँचल
सूने सूने पनघट पर
किस्से दो बोल कहें
किस से पूछे मन्दिर का रस्ता
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
गुमसुम है गोरी की झाँझर
`कोई नही जमना के तट पर
सुंदर शाम कहाँ रहते हैं
क्या हर मिलने वाले से मिलते हैं
राधा से रास रचाते होंगे
यमुना तट पर आते होंगे
पर __कोई नही जो
उनसे मिलवा दे मुझको
कहाँ है मेरा इष्ट देव
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
दो बोल कहे किस से
किस से पूछे राह मन्दिर की
कोन है मेरा इष्टदेव
किस मन्दिर मे फूल चडाऊँ
कहाँ जलाऊँ जा कर दीप
आँख खुली तो अँधियारा था
बड़े हुए तो आंधी तूफां
फिरे ढुढते जीवन भर
कहीं मिला न हम को भगवा
किस दर पर मै मिट जाऊं
किसे बनाऊ मीत
आँचल किसका थाम के बैठु
किसे करू मे प्रीत
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊं
बस्ती बस्ती डगर डगर
हम तो घूमे जीवन भर
मिली नही मस्तों की टोली
जिसमे मे मिल जाऊं
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊँ
कोई नही नदिया के तट पर
मुरझाये मुरझाये चेहरे
फीके फीके आँचल
सूने सूने पनघट पर
किस्से दो बोल कहें
किस से पूछे मन्दिर का रस्ता
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
गुमसुम है गोरी की झाँझर
`कोई नही जमना के तट पर
सुंदर शाम कहाँ रहते हैं
क्या हर मिलने वाले से मिलते हैं
राधा से रास रचाते होंगे
यमुना तट पर आते होंगे
पर __कोई नही जो
उनसे मिलवा दे मुझको
कहाँ है मेरा इष्ट देव
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
दो बोल कहे किस से
किस से पूछे राह मन्दिर की
Sunday, 13 April, 2008
कुछ तो कहो
ऐ बुते संगेमरमर
बेजुबान है तू बे नज़र
न जिस्म मे तेरे लार्जिश१ कोई
न होटों पे कोई जुम्बिश२
न तेरी बाँहों मे कोई बल
तू है सिर्फ़ एक पत्थर
ऐ बुते संगे - मर्मर
तेरी बांसुरी बेसदा है
सुदर्शन तेरा थम गया है
इस दौर के कालिया नाग ने जैसे
तुझे डस लिया हो
सरे महफ़िल नीम उरियाँ ४ है कोई
बिरह की आग मे जल कर
राख हो गई राधा कहीं
मगर तू है बेनयाज़ - ओ बेखबर ५
ऐ बुते- संगे मर्मर
रथों की घर घराहट
तीरों कमान ज़र्रार लश्कर ६
शोरो - गुल
चीखो पुकार
धनुष बांनोकी तन्कारें
जवां मर्दों की ललकारें
देख कर महाभारत का हश्र ७
लगता है तम जंग से घबरा गए
या
किसी दुर्योधन से डर गए
महा नीतीकार
ऐ अजीम हस्ती ८
घंटो की सदा
शंखनाद
अगर्बतियों का धुआं
मदन- मोहन- घन शाम
अपने नाम का
गुण गान सुनकर बारहा ९
मैदाने ज़ंग की निस्बत १०
तीरा तफंग११ की निस्बत
लगता है तुम्हें
मरमरी १२ मंदिरों की फजा १३
रास आ गई है कन्हीया
मगर
ये जुल्मो सितम
बेगुनाहों का कत्ल
कोन रोकेगा यह जोरो -जाबर
कुछ तो कहो
ऐ मालिक- ऐ दिनों इमां
क्यों खुदा से बुत बन गए हो
किसी संग तराश १४ के करिश्मा--१५ हुनर
ऐ बुते संगे मर्मर
_____________________________
१ कम्पन २ कम्पन ३ आवाज रहित ४ अर्ध नग्न ५ लापरवाह ६ भारी फौज ७ परिणाम ८ महँ व्यक्तित्व ९ अनेक बार १० अनुपात ११ अस्त्र शास्त्र १२ मुलायम १३ वातावरण १४ मूर्तिकार १५ कौशल का चमत्कार
बेजुबान है तू बे नज़र
न जिस्म मे तेरे लार्जिश१ कोई
न होटों पे कोई जुम्बिश२
न तेरी बाँहों मे कोई बल
तू है सिर्फ़ एक पत्थर
ऐ बुते संगे - मर्मर
तेरी बांसुरी बेसदा है
सुदर्शन तेरा थम गया है
इस दौर के कालिया नाग ने जैसे
तुझे डस लिया हो
सरे महफ़िल नीम उरियाँ ४ है कोई
बिरह की आग मे जल कर
राख हो गई राधा कहीं
मगर तू है बेनयाज़ - ओ बेखबर ५
ऐ बुते- संगे मर्मर
रथों की घर घराहट
तीरों कमान ज़र्रार लश्कर ६
शोरो - गुल
चीखो पुकार
धनुष बांनोकी तन्कारें
जवां मर्दों की ललकारें
देख कर महाभारत का हश्र ७
लगता है तम जंग से घबरा गए
या
किसी दुर्योधन से डर गए
महा नीतीकार
ऐ अजीम हस्ती ८
घंटो की सदा
शंखनाद
अगर्बतियों का धुआं
मदन- मोहन- घन शाम
अपने नाम का
गुण गान सुनकर बारहा ९
मैदाने ज़ंग की निस्बत १०
तीरा तफंग११ की निस्बत
लगता है तुम्हें
मरमरी १२ मंदिरों की फजा १३
रास आ गई है कन्हीया
मगर
ये जुल्मो सितम
बेगुनाहों का कत्ल
कोन रोकेगा यह जोरो -जाबर
कुछ तो कहो
ऐ मालिक- ऐ दिनों इमां
क्यों खुदा से बुत बन गए हो
किसी संग तराश १४ के करिश्मा--१५ हुनर
ऐ बुते संगे मर्मर
_____________________________
१ कम्पन २ कम्पन ३ आवाज रहित ४ अर्ध नग्न ५ लापरवाह ६ भारी फौज ७ परिणाम ८ महँ व्यक्तित्व ९ अनेक बार १० अनुपात ११ अस्त्र शास्त्र १२ मुलायम १३ वातावरण १४ मूर्तिकार १५ कौशल का चमत्कार
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