Friday 4 December 2009

हम दोनों

तुम और मैं
यानि कि हम दोनों
कितने कमज़ोर
कितने बेबस
मजबूर भी हैं शायद
लेकिन
मायूस ओ अकेले तो नही
एक अजमे सफर तो है
दूर स्याह रातों के किनारों पर
रक्सां सहर तो है
हम उसके लिए चलते हैं
गुजरगाहों के सुर्ख पड़ावों से
ऐसा भी नही कि
हम बच के निकल जायें
ये किसने किया है -ये किसका लहू है
ये जाने बिना यारो
हर लाश के हमराह शब् भर
हम
चिरागों कि तरह जलते हैं
एक अजमे सफर है
दूर स्याह रातों के किनारों पर
वह जो एक
रक्सां सहर है
हम -
यानि कि हम दोनों
में और तुम
उसके लिए चलते हैं
चिरागों कि तरह जलते हैं

Wednesday 23 September 2009

उस पार

उस पार
कहाँ रहते हो तुम
कितने मोड़ आएगे
तेरे घर तक आते आते
सरे रह खड़े
खामोश दरख्तों से
मैं -
तेरा पता पूछूँ
कि न पूछूँ
कोई बोलेगा कि नही बोलेगा
उस पार
यहाँ तुम रहते हो
लोग प्यार को क्या कहते हैं
पहली मुलाकात के बाद
फ़िर - कभी यूँ ही
कोई मिलता है कि नही मिलता
प्यार से डरते तो नही लोग
बोलो
उस पार
मैं - आऊं कभी
कि न आऊं
उस पार
यहाँ तुम रहते हो
लोग प्यार को क्या कहते हैं

Sunday 19 July 2009

बोल कवि

उड़ कर तेरी सोच के पंछी
बोल कवि
अब और कहाँ जायेगे
तरनी तट तरुवर सूखे
घर आँगन
टूट गए दीवारों दर के रिश्ते
जंगल जंगल बस्ती बस्ती
सुबह सवेरे
मुह अंधेरे
घूम गया कोई जैसे
वैर विरोध का घोड़ा लेकर
वह नेजें तलवारें बाँट गया
गावों और शहरों की
दीवारें बाँट गया
छत्तों और मुंडेरों पर
धर्मों के नाम लिख लिए लोगों ने
किस छत पर उतेरेंगे
किस जात का दाना खायेगे
उड़ कर तेरी सोच के पंछी
बोल कवि
अब और कहाँ जायेगे
धरती धरती आग जले
अम्बर अम्बर धुआं

Thursday 16 July 2009

जिद्द

उजालों को
जन्म देने की जिद्द मे
मै
ख़ुद को बो रहा हूँ
अँधेरी ज़मीं के सीने मे

Thursday 14 August 2008

अंतराल

जब भी कोई शब्द मिला
साथ मिले उसके लाखों ही प्रश्न चिन्ह
युग युग की कविता और छंद अनेक
एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
संस्कृति के उच्च शिखरों पर
गौतम की सत्य अहिंसा
तप त्याग वर्धमान का
क्यों महलों से निकले ?
जंगल जंगल भटके क्यों ?
धर्मों के आदर्श कठोर
और उनके सुकुमार बदन
एटमकी गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
इन्द्र धनुषी पींगों के रंग
श्याम वर्ण से घुल जायेंगे
एक प्रश्न चिन्ह मे ढल जायेंगे
महा प्रलय का चित्रण
कैसे कोई चित्रकार करेगा ?
अंधियारे युग का वर्णनं इतिहासकार करेगा कैसे ?
ऐसे कोई परिकल्पना
हिमाच्छादित गिरिश्रिन्ख्ला
मनु कहीं पर बैठा होगा
और भटक रही होंगी कहीं श्रद्धा
आलिंगन - विकास विकास फ़िर
विकास की चरम सीमा
कोन किसीका चीर हरेगा
युद्ध शेत्र कहाँ बनेगा
किसके लिए लडेगा धर्मराज
वह शन् -कृष्ण जब
दिखलायेगा विराट रूप
ओर मोह भंग अर्जुन का होगा
इसबार मगर ऐसा कोई द्रश्यनही होगा
क्योंकि -युद्ध
मात्र एक शण का होगा
ओर यह सब एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
धर्मों के आदर्श कठोर
ओर उनके सुकुमार बदन
एटम की गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे

Saturday 19 July 2008

अल्फ नंगी

न कोई नारा
न हाथ मे परचम
चेहरे पे मसर्रत के नकूश
न क़दमों मे बगावत
साथ उसके न कोई बशर था
न कोई ऐहसासऐ शामो सहर था
बरगद की घनी छाओं मे वह बैठा भी नही
कोई सदा
आहट भी नही कोई
जुल्फों की महक
आँचल की हवा
उसने तेरी आंखों मे देखा भी नही
घनी छाओं मे बैठा भी नही
सैंकड़ों सूरज
लाखों दरिया
समंदर और
कभी न पिघलने वाले बर्फ के घर
दुशवार जंगलों से
कैलाश की चोटियों तक
उसका साया , किसी ने देखा भी नही
वह गंगा के किनारे ठहरा भी नही
उसका साया ?
वह कोई बाद रूह तो नही
नही हरगिज भी नही
कृष्ण की राधा
यशोधरा और सीता
कृष्ण का सुदर्शन
अर्जुन के तीर और गांडीव
सुनसान रास्तों पर
एक कुटिया और
उसमे जलता हुआ दीया
दूर तक तपता हुआ सहरा
एक सरसब्ज दरख्त
और
उसका घना साया
भटके हुए रेवड़
टूटी हुई बंसी
एक बच्चा एक चरवाहा
आसमां पे दौड़ते हुए स्याह बादल
सितारे
ज़मीन और उसकी कशिश
शबनम और सफ़ेद मोती
कहकशां
नाजुक तितलियाँ
फूल और खुशबु
या
सरे मिज़गां ठहरा हुआ आंसू
वर्धमान का तप भी नही
मीरा की भक्ति
शिव की शक्ति भी नही
कुरान
बाइबल
गीता
चुप हैं अजंता की बोलती तस्वीर
शायद यहाँ जिंदगी लिबास बदलती है
मंजिल बहुत करीब है शायद
मय प्यालों मे डाल दो सारी
इधर उधर बिखेर दो शीशे
खुले रहे मयकदों के दरवाजे
मंजिलें बहुत करीब है शायद
हर तरफ धुआं -धुआं
शहर और बस्तियों पर
गिर रही है एटमी धुल
किसी का घर नही महफूज
लोग चाँद पर जा रहे हैं
पत्थर युग का आगाज़ है शायद
समझ नही आता किस तरह याद रखें
हजारों मील लम्बी तहजीब की नज्में
कोन याद रखेगा ?
खैर आओ चलो देखें
कहाँ है वह तहखाना
जहाँ महात्मा बुद्ध का एक अदद बुत
महफूज़ करना है
मंजिलें बहुत करीब हैं शायद
जिंदगी अल्फ नंगी खड़ी है
लगता है लिबास बदल रही है

Tuesday 27 May 2008

गमे दुनिया से कभी

दो चार घड़ी
गमे दुनिया से कभी
फुरसत जो मिले
दुनिया मे सुकूँ की बातें
दमकते हुए आरज २
होंठ
होंटों की फुंसुकार३ हँसी
निगाहों के फुंसूकी बातें
दुनिया मे सुकूँ की बातें
कैसी होती है खुशबु
कैसे खिलते हँ कमल
कैसे बहारों का समां आता है
और ज़ज्बा -ऐ -शौक जवाँ होता है
साकी -जाम -ओ - पैमाने४ के किस्से
सागर - ओ - मय - ओ - मयखाना
रक्स -ऑ -झंकार ५ ये नगमे
अफ्लास ६ की दुनिया से परे
नूर7 के सांचे मे ढले
कमखाब - ऑ८ अतलस का लिबास
रेशमी जुल्फें रेशमी आँचल
इसी धरती पर एक और भी धरती है
इन क़दमों का गुजर
नही जिसके सीने पर
उसके सुख कैसे हैं
लोग कैसे रहते हैं
प्यार के गीत क्या हैं
गीतों की लय क्या है
नयनों से मय का छलकना कैसा
गमे दौरां ९ से जरा
बस एक लमहा १०
फुरसत जो मिले ,राहत11 जो मिले
बिरहा की जलन है कैसी
साजन का मिलना है कैसा
इंतजार के पल क्या हैं
कैसे ढलते हैं सरेशाम
शाम के साये
मह्ब्ब्त की तपिश मे जलना
और जलते रहना
इश्क - ऑ जुनूं की बातें
ऐ काश कि हम भी सोचें
दो चार घडी
गमे दुनिया से कभी
राहत जो मिले
फुरसत जो मिले
______________________
1 शान्ति २ गाल ३ जादूभरी ४ मदिरा पिलाने का पात्र ५ नाच ६ निर्धनता ७ रौशनी ८ बहुमूल्य कपडों का नाम 9 दुःख भरा युग १० शंन ११ शान्ति

Thursday 8 May 2008

एक लम्हा

सिर्फ़ एक लम्हा
वक्त की इकाई
इकाई का भी कोई हिस्सा
सिर्फ़ एक लम्हा
अजनबी निगाहें
निगाहों का हादसा
धड़कते जिस्म , जलते होंठ
नीम उरीयाँ १ जिस्म का उभरा हुआ हिस्सा
बेताब सदा २ ______ मैंने सोचा
बेताब सदा को
अल्फाज़ ३ का पैराहन ४ दूँ
वक्त की इकाई
इकाई का कोई भी हिस्सा____कैद कर लूँ
जंजीर पहना दूँ मगर
वक्त के तकाजों ने
ये हकीर ५ लम्हा भी छीन लिया हमसे
सिर्फ़ एक लम्हा

१ अर्धनग्न २ आवाज़ ३ शब्दों का ४ लिबास ५ तुछ

Tuesday 22 April 2008

वह पगडण्डी

पूजा करूं मैं किसकी
कोन है मेरा इष्टदेव
किस मन्दिर मे फूल चडाऊँ
कहाँ जलाऊँ जा कर दीप
आँख खुली तो अँधियारा था
बड़े हुए तो आंधी तूफां
फिरे ढुढते जीवन भर
कहीं मिला न हम को भगवा
किस दर पर मै मिट जाऊं
किसे बनाऊ मीत
आँचल किसका थाम के बैठु
किसे करू मे प्रीत
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊं
बस्ती बस्ती डगर डगर
हम तो घूमे जीवन भर
मिली नही मस्तों की टोली
जिसमे मे मिल जाऊं
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊँ
कोई नही नदिया के तट पर
मुरझाये मुरझाये चेहरे
फीके फीके आँचल
सूने सूने पनघट पर
किस्से दो बोल कहें
किस से पूछे मन्दिर का रस्ता
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
गुमसुम है गोरी की झाँझर
`कोई नही जमना के तट पर
सुंदर शाम कहाँ रहते हैं
क्या हर मिलने वाले से मिलते हैं
राधा से रास रचाते होंगे
यमुना तट पर आते होंगे
पर __कोई नही जो
उनसे मिलवा दे मुझको
कहाँ है मेरा इष्ट देव
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
दो बोल कहे किस से
किस से पूछे राह मन्दिर की

Sunday 13 April 2008

कुछ तो कहो

ऐ बुते संगेमरमर
बेजुबान है तू बे नज़र
न जिस्म मे तेरे लार्जिश१ कोई
न होटों पे कोई जुम्बिश२
न तेरी बाँहों मे कोई बल
तू है सिर्फ़ एक पत्थर
ऐ बुते संगे - मर्मर
तेरी बांसुरी बेसदा है
सुदर्शन तेरा थम गया है
इस दौर के कालिया नाग ने जैसे

तुझे डस लिया हो
सरे महफ़िल नीम उरियाँ है कोई
बिरह की आग मे जल कर
राख हो गई राधा कहीं
मगर तू है बेनयाज़ - ओ बेखबर ५
ऐ बुते- संगे मर्मर
रथों की घर घराहट
तीरों कमान ज़र्रार लश्कर ६
शोरो - गुल
चीखो पुकार
धनुष बांनोकी तन्कारें
जवां मर्दों की ललकारें
देख कर महाभारत का हश्र ७
लगता है तम जंग से घबरा गए
या
किसी दुर्योधन से डर गए
महा नीतीकार
अजीम हस्ती ८
घंटो की सदा
शंखनाद
अगर्बतियों का धुआं
मदन- मोहन- घन शाम
अपने नाम का
गुण गान सुनकर बारहा ९
मैदाने ज़ंग की निस्बत १०
तीरा तफंग११ की निस्बत
लगता है तुम्हें
मरमरी १२ मंदिरों की फजा १३
रास आ गई है कन्हीया
मगर
ये जुल्मो सितम
बेगुनाहों का कत्ल
कोन रोकेगा यह जोरो -जाबर
कुछ तो कहो
ऐ मालिक- ऐ दिनों इमां
क्यों खुदा से बुत बन गए हो
किसी संग तराश १४ के करिश्मा--१५ हुनर
ऐ बुते संगे मर्मर
_____________________________
१ कम्पन २ कम्पन ३ आवाज रहित ४ अर्ध नग्न ५ लापरवाह ६ भारी फौज ७ परिणाम ८ महँ व्यक्तित्व ९ अनेक बार १० अनुपात ११ अस्त्र शास्त्र १२ मुलायम १३ वातावरण १४ मूर्तिकार १५ कौशल का चमत्कार

Monday 7 April 2008

शहर

सूरज ग्रहण के मेले पर
११ -९-८८
________________
शहर तेरी ज़मीं
अब लहू रंग नही
न कहीं फौज
न ज़ंग न दूर तक फैले हुए जंगल
अब कहीं - ऐसा
कोई बरगद भी नही
जिसके साए तले
फौजों के काफिले ठहरे
जिस के पत्तों की आंखों मे
तैरती हो हाथियों की तसवीरें
ज़ख्म -खुर्दा 1-जवां
दिलखराश २ चीखें
टूटे हुए रथ
गर्द -ओ -गुबार
आग बरसाते हुए बादल
कर्ण और अर्जुन के तीर
दुर्योधन और भीम की शक्लें
हर तरफ घूमता इक सुदर्शन
ये मनाज़र 3 किसने देखे हैं
चश्मदीद ४ गवाह कोई
नही - कोई नही
शहर तेरी ज़मीं -अब लहू रंग नही
हर्षवर्धन के अजी शहर ५
कदीम६ खनढहरों से निकल
बोसीदा७ लिबास बदल
शहर आ
आ मेरे हाथ मे हाथ दे
आ पवित्र तालाब मे
गोताजन हों
आ शहर आ मेरा साथ दे
आ मेरे हाथ मे हाथ दे
_________________________________
१ जख्म खाए हुए २ दिल को चीर देने वाली ३ दृश्य ४ आंखों देखा ५ महाननगर ६ पुराने ७ जीर्ण शीर्ण

Tuesday 1 April 2008

तुम खुदा भी हो

और ये शायद
इस कदर ज़रूरी भी नही
हजूर तुम साफ क्यों नही कहते
खुदा कि तुम खुदा भी हो
तेरा नाम लेकर , हर बात हो
दिन खत्म हो
रात कि शुरुआत हो
मगर क्यों नही कहते
तुम मयकाशों1 के साथ रहते हो
कभी सागर कभी मीना कभी साकी
और ये मयखाना भी तेरा है
ऐश्गाहों2 मे तुझे अक्सर
महव-ऐ-रक्स३ देखा है
लोग कहते है____मगर
तुम इन सब से जुदा भी हो
खुदा की तुम खुदा भी हो
जमना के किनारे घूमते हो
बे-नयाज़४ ओ - बे-फिक्र
लगता है गवालों से तेरा
कोई रिश्ता भी है
इन सब के बीच शायद
इक तेरी राधा भी है
आंखों मे बसे सपने की तरह
तुझे अपना समझते हैं वो अपनों की तरह
भंवरे-फूल -कलियाँ - जमना -रेत और माटी
तुम सब मे बसते हो
ज़ल्ज़ले -तूफ़ान -आंधियां मैदाने ज़ंग
गुरु-भाई और बेटे
तीर-शंख-नाद ,और
ज़ंग के सुर्ख बादल भी तेरे हैं
लडो और
तुम ख़ुद भी लड़ते हो
अमल५ को अव्वल६ समझते हो
मिटाते हो कभी
कभी ख़ुद तामीर७ करते हो
मंजिल भी -मुसाफिर भी
तुम रहनुमा८ भी हो
खुदा की तुम खुदा भी हो
बर्ग -ओ -बार
ये शजर१०
नदियाँ -आबशार११
समुन्दर -चाँद और ये ज़मीन
उजड़े हुए मकान
टूटे हुए यकीं१२
मुझ मे-और
मेरे फनकार मे
जब तुम -ख़ुद ही तौ हो मकिन१३
तौ फ़िर - हजूर
साफ क्यों नही कहते
और ये शायद
इस कदर जरूरी भी नही - की
हाथ उठे और दुआ भी हो
खुदा तुम खुदा भी हो
_
___________________

१ शराबियों २ विलास का स्थान ३ नाच मे लीन ४ निर्लिप्त ५ कर्म ६ मुख्य ७ बनाना ८ पथ प्रदर्शक
९ पत्ते और फल १० वृक्ष ११ झरना १२ विश्वास १३ रहना

Sunday 30 March 2008

खयालात भी जल जायेंगे

बहुत गर्म है माहोल
दूर तक ता - हद्दे नज़र
सुर्ख-सुर्ख है ज़मीन का जिस्म
आकाश पर उग रहे हां
हजारों आफ़ताब
बह रहा है आतिश फिषा का लावा सा
जैसे फर्श हो किसी मक्तल का
नर्म - ओ - नाजुक पत्तियां
खेतियां
सब बस्तियां जल गई
शोला -शोला है बरगदों के ताने
पर्वतों पर पत्थर पिघल गए
दूर दूर तक
सुर्ख-सुर्ख है ज़मीन का रंग
इबादतगाहो के निशा
गुरूद्वारे
मस्जिदें
मंदिरों के कलश
ज़मीन के रकबे
अजीम शहर
जो वाएस-ऐ ज़ंग थे
नज़रे ज़ंग हो गए
रास्ते पग डंडियाँ
अज़नास के ज़खीरे
बड़ी बड़ी मंडियां
सुपुर्द -ऐ-आग कर दी गई
रहनुमा भी जले
राहे-रौउ भी जला
बहुत गर्म है माहोल
आसमान पर उग रहे हैं
हजारों आफ़ताब
किस कदर भयानक है
आज के हालात
लगता है खयालात भी जल जायेगे
बहुत गर्म है माहौल

माहौल___वातावरण
मक्तल ___कत्ल करने का स्थान
इबादत गहों __पूजा स्थल
अजीम_____ महान
वाएस-ऐ ____कारण
अज़नास ___अनाज का बहु वचन
ज़खीरे ____भंडार
रहनुमा ___पथ प्रदर्शक
राहे ___ पथिक
आफ़ताब ___सूर्य

Thursday 27 March 2008

कुरुक्षेत्र के मैदान - ऐ - ज़ंग से

मे और
मेरे अन्दर जो इक
शायर है तेरे साथ भाग रहे हैं
dus मील लम्बी दोड ही नही
बल्कि , बहुत
लम्बी दोड
कुरुक्षेत्र के मैदाने ज़ंग से
तेरे जलते हुए सहराओं तक
लगातार
शाम- ओ - सहर
इसलिए नही कि
तेरे मकान
तेरे शहर
तेरे वतन के बड़े हिस्से पर
वक्त के खूंखार परिंदे ने
अपने खोफ्नाक पर फैला दिए हैं
इसलिए नही कि
तेरे वतन कि हर राहगुजर पर
आदमी और हड्डियों के ढेर उग आए हैं
और इसलिए भी नही कि
वकतi कि गरम सांसों ने
तेरे माहोल मे आग भर दीहै
बल्कि इसलिए कि
तुमने वकत के खिलाफ
इक द्लेराना आवाज़ दी है
तुम कहीं जबर से हार न जाओ
तेरे मजबूत कदम
कहीं थक न जाएं
मेरे दोस्त _ बस
फकत -इसलिए
मे- और
मेरे अन्दर जो इक शायर है
तेरे साथ- भाग रहे हैं
कुरुक्षेत्र के मैदाने ज़ंग से

अफ्रीका के लोगों के नाम, जब उन्होंने वक़्त के खिलाफ दस मील लम्बी दौड़ दौड़ी







दीया

इक दीया हूँ किसी कुटिया मे जलाओ मुझको ।
अच्छा नही लग रहा ॥ सरे बज्म फरोजा रहना ॥
मदन