Tuesday 22 April 2008

वह पगडण्डी

पूजा करूं मैं किसकी
कोन है मेरा इष्टदेव
किस मन्दिर मे फूल चडाऊँ
कहाँ जलाऊँ जा कर दीप
आँख खुली तो अँधियारा था
बड़े हुए तो आंधी तूफां
फिरे ढुढते जीवन भर
कहीं मिला न हम को भगवा
किस दर पर मै मिट जाऊं
किसे बनाऊ मीत
आँचल किसका थाम के बैठु
किसे करू मे प्रीत
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊं
बस्ती बस्ती डगर डगर
हम तो घूमे जीवन भर
मिली नही मस्तों की टोली
जिसमे मे मिल जाऊं
कहीं जली न दीपशिखा वह
जिस पर मे जल जाऊँ
कोई नही नदिया के तट पर
मुरझाये मुरझाये चेहरे
फीके फीके आँचल
सूने सूने पनघट पर
किस्से दो बोल कहें
किस से पूछे मन्दिर का रस्ता
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
गुमसुम है गोरी की झाँझर
`कोई नही जमना के तट पर
सुंदर शाम कहाँ रहते हैं
क्या हर मिलने वाले से मिलते हैं
राधा से रास रचाते होंगे
यमुना तट पर आते होंगे
पर __कोई नही जो
उनसे मिलवा दे मुझको
कहाँ है मेरा इष्ट देव
कहाँ मिलेगी वह पगडण्डी
दो बोल कहे किस से
किस से पूछे राह मन्दिर की

Sunday 13 April 2008

कुछ तो कहो

ऐ बुते संगेमरमर
बेजुबान है तू बे नज़र
न जिस्म मे तेरे लार्जिश१ कोई
न होटों पे कोई जुम्बिश२
न तेरी बाँहों मे कोई बल
तू है सिर्फ़ एक पत्थर
ऐ बुते संगे - मर्मर
तेरी बांसुरी बेसदा है
सुदर्शन तेरा थम गया है
इस दौर के कालिया नाग ने जैसे

तुझे डस लिया हो
सरे महफ़िल नीम उरियाँ है कोई
बिरह की आग मे जल कर
राख हो गई राधा कहीं
मगर तू है बेनयाज़ - ओ बेखबर ५
ऐ बुते- संगे मर्मर
रथों की घर घराहट
तीरों कमान ज़र्रार लश्कर ६
शोरो - गुल
चीखो पुकार
धनुष बांनोकी तन्कारें
जवां मर्दों की ललकारें
देख कर महाभारत का हश्र ७
लगता है तम जंग से घबरा गए
या
किसी दुर्योधन से डर गए
महा नीतीकार
अजीम हस्ती ८
घंटो की सदा
शंखनाद
अगर्बतियों का धुआं
मदन- मोहन- घन शाम
अपने नाम का
गुण गान सुनकर बारहा ९
मैदाने ज़ंग की निस्बत १०
तीरा तफंग११ की निस्बत
लगता है तुम्हें
मरमरी १२ मंदिरों की फजा १३
रास आ गई है कन्हीया
मगर
ये जुल्मो सितम
बेगुनाहों का कत्ल
कोन रोकेगा यह जोरो -जाबर
कुछ तो कहो
ऐ मालिक- ऐ दिनों इमां
क्यों खुदा से बुत बन गए हो
किसी संग तराश १४ के करिश्मा--१५ हुनर
ऐ बुते संगे मर्मर
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१ कम्पन २ कम्पन ३ आवाज रहित ४ अर्ध नग्न ५ लापरवाह ६ भारी फौज ७ परिणाम ८ महँ व्यक्तित्व ९ अनेक बार १० अनुपात ११ अस्त्र शास्त्र १२ मुलायम १३ वातावरण १४ मूर्तिकार १५ कौशल का चमत्कार

Monday 7 April 2008

शहर

सूरज ग्रहण के मेले पर
११ -९-८८
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शहर तेरी ज़मीं
अब लहू रंग नही
न कहीं फौज
न ज़ंग न दूर तक फैले हुए जंगल
अब कहीं - ऐसा
कोई बरगद भी नही
जिसके साए तले
फौजों के काफिले ठहरे
जिस के पत्तों की आंखों मे
तैरती हो हाथियों की तसवीरें
ज़ख्म -खुर्दा 1-जवां
दिलखराश २ चीखें
टूटे हुए रथ
गर्द -ओ -गुबार
आग बरसाते हुए बादल
कर्ण और अर्जुन के तीर
दुर्योधन और भीम की शक्लें
हर तरफ घूमता इक सुदर्शन
ये मनाज़र 3 किसने देखे हैं
चश्मदीद ४ गवाह कोई
नही - कोई नही
शहर तेरी ज़मीं -अब लहू रंग नही
हर्षवर्धन के अजी शहर ५
कदीम६ खनढहरों से निकल
बोसीदा७ लिबास बदल
शहर आ
आ मेरे हाथ मे हाथ दे
आ पवित्र तालाब मे
गोताजन हों
आ शहर आ मेरा साथ दे
आ मेरे हाथ मे हाथ दे
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१ जख्म खाए हुए २ दिल को चीर देने वाली ३ दृश्य ४ आंखों देखा ५ महाननगर ६ पुराने ७ जीर्ण शीर्ण

Tuesday 1 April 2008

तुम खुदा भी हो

और ये शायद
इस कदर ज़रूरी भी नही
हजूर तुम साफ क्यों नही कहते
खुदा कि तुम खुदा भी हो
तेरा नाम लेकर , हर बात हो
दिन खत्म हो
रात कि शुरुआत हो
मगर क्यों नही कहते
तुम मयकाशों1 के साथ रहते हो
कभी सागर कभी मीना कभी साकी
और ये मयखाना भी तेरा है
ऐश्गाहों2 मे तुझे अक्सर
महव-ऐ-रक्स३ देखा है
लोग कहते है____मगर
तुम इन सब से जुदा भी हो
खुदा की तुम खुदा भी हो
जमना के किनारे घूमते हो
बे-नयाज़४ ओ - बे-फिक्र
लगता है गवालों से तेरा
कोई रिश्ता भी है
इन सब के बीच शायद
इक तेरी राधा भी है
आंखों मे बसे सपने की तरह
तुझे अपना समझते हैं वो अपनों की तरह
भंवरे-फूल -कलियाँ - जमना -रेत और माटी
तुम सब मे बसते हो
ज़ल्ज़ले -तूफ़ान -आंधियां मैदाने ज़ंग
गुरु-भाई और बेटे
तीर-शंख-नाद ,और
ज़ंग के सुर्ख बादल भी तेरे हैं
लडो और
तुम ख़ुद भी लड़ते हो
अमल५ को अव्वल६ समझते हो
मिटाते हो कभी
कभी ख़ुद तामीर७ करते हो
मंजिल भी -मुसाफिर भी
तुम रहनुमा८ भी हो
खुदा की तुम खुदा भी हो
बर्ग -ओ -बार
ये शजर१०
नदियाँ -आबशार११
समुन्दर -चाँद और ये ज़मीन
उजड़े हुए मकान
टूटे हुए यकीं१२
मुझ मे-और
मेरे फनकार मे
जब तुम -ख़ुद ही तौ हो मकिन१३
तौ फ़िर - हजूर
साफ क्यों नही कहते
और ये शायद
इस कदर जरूरी भी नही - की
हाथ उठे और दुआ भी हो
खुदा तुम खुदा भी हो
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१ शराबियों २ विलास का स्थान ३ नाच मे लीन ४ निर्लिप्त ५ कर्म ६ मुख्य ७ बनाना ८ पथ प्रदर्शक
९ पत्ते और फल १० वृक्ष ११ झरना १२ विश्वास १३ रहना