जब भी कोई शब्द मिला
साथ मिले उसके लाखों ही प्रश्न चिन्ह
युग युग की कविता और छंद अनेक
एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
संस्कृति के उच्च शिखरों पर
गौतम की सत्य अहिंसा
तप त्याग वर्धमान का
क्यों महलों से निकले ?
जंगल जंगल भटके क्यों ?
धर्मों के आदर्श कठोर
और उनके सुकुमार बदन
एटमकी गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
इन्द्र धनुषी पींगों के रंग
श्याम वर्ण से घुल जायेंगे
एक प्रश्न चिन्ह मे ढल जायेंगे
महा प्रलय का चित्रण
कैसे कोई चित्रकार करेगा ?
अंधियारे युग का वर्णनं इतिहासकार करेगा कैसे ?
ऐसे कोई परिकल्पना
हिमाच्छादित गिरिश्रिन्ख्ला
मनु कहीं पर बैठा होगा
और भटक रही होंगी कहीं श्रद्धा
आलिंगन - विकास विकास फ़िर
विकास की चरम सीमा
कोन किसीका चीर हरेगा
युद्ध शेत्र कहाँ बनेगा
किसके लिए लडेगा धर्मराज
वह शन् -कृष्ण जब
दिखलायेगा विराट रूप
ओर मोह भंग अर्जुन का होगा
इसबार मगर ऐसा कोई द्रश्यनही होगा
क्योंकि -युद्ध
मात्र एक शण का होगा
ओर यह सब एक प्रश्नचिन्ह मे ढल जायेगे
धर्मों के आदर्श कठोर
ओर उनके सुकुमार बदन
एटम की गर्मी से अन्तराल तक जल जायेगे
Thursday 14 August 2008
Subscribe to:
Posts (Atom)